मिट्टी के ढेले

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बारिश के दौरान, गीली मिट्टी के ढेले बनाना, दोनों को ही बहुत प्रिय था। शायद उनकी दोस्ती की सबसे पहली याद भी वही थी. दोनों के घर भी आमने सामने थे, तो एक दूसरे का साथ पाने में उन्हें मुसीबत भी नहीं होती. पक्के यारों की तरह दोनों एक दूसरे के कंधे पे हाथ जमाए मोहल्ले के बीसों चक्कर काट देते। उन्हें देख के ऐसा लगता जैसे बिछड़ के खोने के डर से, एक दूसरे को कस कर पकड़ रखा है.

कितनी ही जामुनें उन्होंने साथ में बीनी होंगी, कितने ही मौसम पुलिया से पैर लटका के बिताये होंगे, कितना ही वक़्त एक दूसरे के साथ उन्होंने काटा होगा, इसका एहसास उन्हें कभी हुआ ही नही. दोनों के विद्यालय भले अलग थे, पर ज़िन्दगी गेंद-बल्ले की व्याकरण और अमरुद तोड़ने की गणित से आगे कभी बढ़ी ही नहीं.

दोनों के परिवारों की आर्थिक स्तिथि भिन्न होने के बावजूद उनके भाव और बातें एक सी ही थीं. गंगा- जमुनी तहज़ीब के उदाहरण जैसे, दोनों एक ही मिट्टी से बने पता चलते. दोनों ने एक दूसरे के नाम भी रख रखे थे, पर उनके अलावा उनके इन नामों को कोई नहीं जानता था. उनमे आपस में एक बिन्नी बन्दर था, और एक टीटू टमाटार.

वक़्त के साथ- साथ, उनकी तरह ही, लड़कपन भी जवानी का कन्धा थाम रहा था. ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार पकड़ने को थी, और वो दोनों , ‘ गेंद विकेट पे लगी की नहीं ‘, इसी बहस में रोजाना उलझ रहे थे. गंभीर बातें, ‘लड़की देख कर मोहल्ला बताने’ तक ही सीमित थीं.

हमेशा की तरह अपनी इधर उधर की बातों के दौरान एक दिन, टीटू ने बताया कि शायद उसके माता पिता उसे दसवीं के बाद दूसरे शहर भेज रहे हैं. बिन्नी को पढाई छोड़ कर अपने पिता के साथ चाय की दुकान पर लगना होगा यह वो जानता था, इसलिए वो ये बात कभी उठाता नहीं था. दोस्ती में ईमानदारी बरतने के लिहाज़ से, यह बताना अब आवश्यक हो चला था.

बारी अब, वक़्त के  बेख़ौफ़ दौड़ने की थी.

अलग अलग शहरों में ज़िंदगियाँ कटती रहीं. नए लोगों और नए रहन सहन को टीटू ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया. नए दोस्त और नए शौक ही उसकी एकमात्र पहचान रह गए थे. मोबाइल अथवा टेलीफ़ोन की सुविधा तो थी नहीं, तो होली – दिवाली पे एक के घर आने से ज़रूर चाय पे मुलाकात हो जाती. बातें भी खूब होतीं. बड़े शहर के किस्से, बिन्नी बड़े चाव से सुनता। बताने को तो उसके पास कुछ होता नहीं था. उसकी ज़िन्दगी के किस्से जिसके साथ बनते थे, वही अब उसकी ज़िन्दगी का पुराना किस्सा हो रहा था.

आठ सालो की दूरी से, बातों और विचारों की दूरियां भी बढ़ गयीं. अब टीटू घर आने पे बिन्नी के सामने पड़ने से बचता. उसे बिन्नी की बातें मूर्खतापूर्ण जान पड़तीं। मुलाकात हो जाने पर वह उस से, जल्द से जल्द पीछा छुड़ाने की कोशिश करता. उसके सामने अपना महंगा मोबाइल निकालने में उसे बहुत असहज महसूस होता. धीरे धीरे मुलाकातें बंद सी हो गईं. घर वालो के पूछने पर वह दो टूक जवाब दे देता कि, अभी उसका मंन नहीं है, वह बाद में सामने वाले लड़के से मिल आएगा.

साहिल से छूटी नाव की तरह ही, दोनों अब दूर हो चुके थे. दोनों की ही शादियां हुईं। शहर अलग होने का बहाना टीटू के अच्छा काम आया। टीटू टमाटर और बिन्नी बन्दर जैसे नाम तो, कब के कट चुके जामुन और अमरुद के पेड़ों की तरह, मोहल्ले से गायब थे.

साल में एक बार, आठ – दस दिन के लिए टीटू परिवार के साथ घर आ जाता । उसका बेटा इतनी खुली जगह और साफ़ मौसम देख के बाहर दौड़ जाने  को चहक उठता। बारिश की एक रोज़ भी वैसा ही हुआ.

खुशनुमा मौसम के साथ होती मद्धम बारिश एक रूमानी माहौल सजाये हुए थी. टीटू का बेटा बहुत देर से सामने वाले घर के लड़के को देख रहा था. वह लड़का गीली मिटटी में न जाने क्या कर रहा था. घर में बंद पड़े – पड़े उकता जाने से उसकी  बाहर जाने की लालसा और प्रबल हो उठी. उसने अपने पिता से कहा कि, वो सामने वाले घर तक ही जाएगा, और कुछ देर में आ जाएगा. और फिर, वह उन्हें वहाँ से दिखता भी रहेगा।

वह दौड़ने को हुआ ही था कि, उसके पिता ने उसे कड़क कर रोक दिया. उन्होंने कहा कि, क्या उसे विद्यालय में यही सिखाया गया है कि, वो उस बन्दर के बच्चे की तरह मिट्टी में लोटे.

यह सुन कर वह मायूस हो गया। सामने वाला लड़का ‘बन्दर का बच्चा’, उसके पिता के लिए रहा होगा, उसके लिए तो नही. तो फिर वह क्यों नहीं जा सकता. पर पिता के डर से वो सर झुकाये अंदर चला गया

बारिश काफी तेज़ हो गई, मिटटी के दो ढेले तेज़ धार में बहे जा रहे थे.
कुछ देर में दोनों का ही अस्तित्व ख़त्म हो गया, मानो कभी एक जैसे दो ढेले वहां थे ही नहीं,..